Sunday, July 12, 2009

मानवाधिकार की परिकल्‍पना एवम्‌ अर्न्‍तद्वन्‍द्व


July 8, 2009
वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : मानवाधिकार की परिकल्‍पना एवम्‌ अर्न्‍तद्वन्‍द्व





मनुष्‍य के व्‍यक्‍तित्‍व के विकास के लिये सामाजिक वातावरण का स्‍वस्‍थ्‍य दृष्‍टिकोण आवश्‍यक होता है क्‍योंकि स्‍वस्‍थ्‍य (सकारात्‍मक) परिस्‍थितियों के द्वारा ही कोई व्‍यक्‍ति अपना विकास कर सकता है। समाज में मनुष्‍य के व्‍यक्‍तित्‍व के विकास के लिये कतिपय अधिकारों की आवश्‍यकता होती है अर्थात्‌ इनके अभाव में उसके व्‍यक्‍तित्‍व का विकास समाज में संभव नहीं है। इन्‍हीं को मानव अधिकार कहा जाता है। मानवाधिकार शब्‍द अपने आपमें स्‍वतंत्र अस्‍तित्‍व रखता है क्‍योंकि मानव अपने अस्‍तित्‍व में आने तक की यात्रा में उसे अधिकार विरासत में प्राप्‍त होते चले गये। नैतिक एवं कानूनी रूप में जब हम मानव अधिकार की बात करते हैं तो जो मानव जाति के विकास के लिये मूलभूत मानवीय गरिमा को सुनिश्‍चित करता हो वह मानवाधिकार कहलाता है। मानव अधिकार मानव के विशेष अस्‍तित्‍व के कारण उनसे सम्‍बन्‍धित है इसलिये ये जन्‍म से ही प्राप्‍त हैं और इसकी प्राप्‍ति में जाति, लिंग, धर्म, भाषा, रंग तथा राष्‍ट्रीयता बाधक नहीं होती। मानव अधिकार को ‘मूलाधिकार' आधारभूत अधिकार अन्‍तर्निहित अधिकार तथा नैसर्गिक अधिकार भी कहा जाता है। ‘‘मानव अधिकार की कोई सर्वमान्‍य विश्‍वव्‍यापी परिभाषा नहीं है। इसलिये राष्‍ट्र इसकी परिभाषा अपने सुविधानुसार देते हैं। विश्‍व के विकसित देश मानवाधिकार की परिभाषा को केवल मनुष्‍य के राजनीतिक तथा नागरिक अधिकारों को भी शामिल रखते हैं।'' मानवाधिकार को कानून के माध्‍यम से स्‍थापित किया जा सकता है। इसका विस्‍तृत फलक होता है, जिसमें नागरिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक अधिकार भी आते हैं, ‘‘चीन तथा इस्‍लामी राज्‍य कहते हैं कि मानवाधिकार की परिभाषा, सांस्‍कृतिक मूल्‍य के अन्‍तर्गत दी जानी चाहिये अर्थात्‌ मानवाधिकार में मनुष्‍यों के सांस्‍कृतिक अधिकार को भी शामिल किया जाना चाहिये। चूँकि मानव के अधिकार नैसर्गिक हैं, लेकिन सामाजिक जागरूकता और कर्तव्‍यों की जानकारी न होने के कारण मानव के अधिकारों का हनन हो रहा है। ऐसी स्‍थिति में मानवाधिकार राज्‍य से विधिमान्‍य अपेक्षाएं रखता है साथ ही अपेक्षा करता है कि राज्‍य मानवाधिकार का निर्माता होने के साथ-साथ संरक्षक भी रहे।

मानव अधिकारों के पद का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिका के राष्‍ट्रपति रूजवेल्‍ट ने जनवरी 1941 में कांग्रेस को सम्‍बोधित अपने प्रसिद्ध संदेश में किया था, जिसमें उन्‍होंने चार मर्मभूत स्‍वतंत्रताओं वाक्‌ स्‍वातंत्र्य गरीबी से मुक्‍ति और भय से स्‍वातंत्र्य पर आधारित विश्‍व की घोषणा की थी। अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जब मानवाधिकार की बात होती है, तब इसे मानवाधिकार बिल के रूप में कोडीकृत तथा परिभाषित किया गया। इसमें विभिन्‍न अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलनों एवं घोषणाओं का योगदान है । मानवाधिकार के विकास में वैधानिक प्रावधान, प्रशासनिक आदेश तथा स्‍थानीय स्‍तर पर न्‍यायिक घोषणाओं की महती भूमिका रही है। वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में मानवाधिकार की यदि हम बात करें तो मानव-अधिकार की विभिन्‍न समस्‍याएं नस्‍लीय भेदभाव, भाषायी अधिकार, धार्मिक अधिकार, स्‍वतंत्रता, लैंगिक भेदभाव (लिंगभेद), मृत्‍युदंड, पुलिस अत्‍याचार (नृशंसता) मौलिक अधिकार के उल्‍लंघन से जुड़ी हुई हैं। मानवाधिकार से जुड़ी ये समस्‍याएं अब अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर नीति-निर्माताओं, शिक्षकों, समाजसेवियों एवं छात्रों का ध्‍यान आकर्षित करने लगी हैं।

स्‍वतंत्र भारत का संविधान हर नागरिक के मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा की गारण्‍टी देता है। भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 21 के अन्‍तर्गत प्रत्‍येक नागरिक को अपनी मानवीय गरिमा से जीने का अधिकार सुनिश्‍चित करता है। इसके तहत प्रत्‍येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन व्‍यतीत करने के साथ कुछ न्‍यूनतम आवश्‍यकतायें अनिवार्य हैं, जिसमें मजदूरों (स्‍त्री एवं पुरूष) के स्‍वास्‍थ्‍य एवं शक्‍ति तथा बच्‍चों के शोषण के विरूद्ध संरक्षण के साथ बच्‍चों को स्‍वस्‍थ्‍य रूप से विकसित होने के साथ-साथ, स्‍वतंत्रता एवं गरिमा का माहौल बनाए रखना, समान शिक्षा का अवसर प्रदान करना तथा मातृत्‍व सुविधा प्रदान करने के लिए न्‍यायपूर्ण एवं मानवोचित परिवेश बनाना चाहिए। लेकिन हकीकत कुछ भी हो परन्‍तु स्‍वतंत्र भारत के संविधान लागू होने के आधी सदी से अधिक बीत जाने के बाद लोगों में मानवाधिकारों के प्रति सजगता तो दिखती है परन्‍तु अपने कार्यक्षेत्र में अपने विरूद्ध किए जा रहे उत्‍पीड़न को चुपचाप सहते रहते हैं। ऐसी स्‍थिति में मानवाधिकार के लिए उपयुक्‍त वातावरण पैदा करना, विकास का केन्‍द्रीय एवं अपरिवर्तनीय लक्ष्‍य हो गया है।

रूजवेल्‍ट ने कहा था ‘‘स्‍वातन्‍त्र्य से हर जगह मानव अधिकारों की सर्वोच्‍चता अभिप्रेत है। हमारा समर्थन उन्‍हीं को है, जो इन अधिकारों को पाने के लिए या बनाये रखने के लिये संघर्ष करते हैं - मानव अधिकारों पद का प्रयोग अटलांटिक चार्टर में किया गया था। उसी के अनुरूप मानव अधिकारों पद का लिखित प्रयोग संयुक्‍त राष्‍ट्र चार्टर में पाया जाता है। जिसको द्वितीय विश्‍व युद्ध के पश्‍चात सेन फ्रांसिसको में 25 जून 1945 को अंगीकृत किया गया है।'' मानवाधिकार की विश्‍वव्‍यापी घोषणा संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के बैनर तले हुई। 10 दिसम्‍बर 1948 के संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने मानवाधिकार आंदोलन को अंतर्राष्‍ट्रीय शांति के लिए अनिवार्य तत्‍व के रूप में प्रारंभ करने के साथ मानवाधिकार चार्टर भी प्रकाशित किया। संघ अपने सदस्‍यों से अपेक्षा करता है कि इसके चार्टर का ईमानदारी से पालन किया जाए। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा से पूर्व भी यद्यपि इस दिशा में स्‍थानीय स्‍तरों पर छोटे-मोटे प्रयास किये जाते रहे हैं जिनके योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता है पूर्व में किये गये इन छुटपुट प्रयासों के आंकलन से विदित होता है कि ‘‘सबसे पहले मानवाधिकारों के लिये संघर्ष की शुरूआत 15 जून 1215 से हुई जब ब्रिटेन के तत्‍कालीन सम्राट जॉन को उसके मामलों द्वारा कतिपय मानवीय अधिकारों को मान्‍यता देने वाले घोषणा-पत्र पर हस्‍ताक्षर करने के लिये विवश किया गया था। इतिहास में इसे ‘मैग्‍नाकार्टा' कहा जाता है, मैग्‍नाकार्टा के द्वारा जो अधिकार सामन्‍तों को प्राप्‍त हुये वे कालान्‍तर में जनसाधारण को हस्‍तान्‍तरित हो गए। इसी प्रकार वर्ष 1628 के अधिकार-पत्र पर ब्रिटेन के सम्राट के हस्‍ताक्षर करवाने में ब्रिटेन की संसद सफल हुई जो कालान्‍तर में मानवीय अधिकारों के क्षेत्र में मील के पत्‍थर सिद्ध हुए।'' मानवाधिकार की अंतर्राष्‍ट्रीय घोषणा के तहत निम्‍न अधिकार समाहित हैं -

* वाक स्‍वतंत्रता का अधिकार

* न्‍यायिक उपचार का अधिकार

* सरकार (किसी देश में) की भागीदारी का अधिकार

* काम का अधिकार

* स्‍तरीय जीवन जीने का अधिकार

* आराम एवं सुविधापूर्ण जीवन जीने का अधिकार

* शिक्षा का अधिकार

* समान काम के लिए समान वेतन का अधिकार

* सामाजिक सुरक्षा का अधिकार

* वैज्ञानिक प्रगति में भाग एवं उससे लाभ लेने का अधिकार

* जीवन, सुरक्षा एवं स्‍वतंत्रता का अधिकार

* मनमानी ढंग से गिरफ्‍तारी अथवा निर्वासन के विरूद्ध अधिकार

* विचार, विवेक एवं धार्मिक स्‍वतंत्रता

* निष्‍पक्ष एवं स्‍वतंत्र न्‍यायिक सुनवाई का अधिकार

* शांतिपूर्ण सभा संगोष्‍ठी करने तथा संघ बनाने का अधिकार

संयुक्‍त राष्‍ट्र के इस घोषणा पत्र के मूल में मात्र प्रजातांत्रिक (लोकतांत्रिक) संविधानों में निहित नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार ही नहीं अपितु कई आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक अधिकारों की भी चर्चा है। प्रत्‍येक नागरिक एवं राष्‍ट्र के लिये अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मानव अधिकार घोषणा पत्र पर हस्‍ताक्षर करने वाले प्रत्‍येक देश का यह कर्तव्‍य है कि वे अपने यहाँ इन अधिकारों का संवर्द्धन तथा संरक्षण सुनिश्‍चित करें साथ ही प्रत्‍येक नागरिक के लिये इन अधिकारों को प्रभावी बनाने तथा उनका निरीक्षण करने के लिये जागरूक एवं प्रेरित किया जाना चाहिए।

सन्‌ 1948 से सन्‌ 1954 के बीच संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार आयोग ने वैधानिक रूप से दो मसौदे तैयार किए। सन्‌ 1976 में आर्थिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक अधिकारों से सम्‍बन्‍धित अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मसौदा तैयार किया गया। इस अन्‍तर्राष्‍ट्रीय घोषणा के साथ-साथ इन प्रावधानों को जोड़कर अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मानवाधिकार बिल बनाया गया। इसमें नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार जहाँ परम्‍परागत अधिकार की श्रेणी में आते हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक अधिकार, आधुनिक अधिकार हैं।

मानवाधिकार किसी व्‍यक्‍ति या समूह विशेष द्वारा की जाने वाली मांग से ज्‍यादा राज्‍य के कर्तव्‍य क्षेत्र का हिस्‍सा होना चाहिए। यदि किसी भी व्‍यक्‍ति या समूह द्वारा यह तथ्‍य उभारा या प्रस्‍तुत किया जा रहा है कि उसका मानवाधिकार हनन हो रहा है, उसके जीवन के प्रति विपरीत परिस्‍थितियां हैं तो यह राज्‍य की उपेक्षा को प्रदर्शित करता है। राज्‍य सत्‍ता से चलता है और सत्‍ता के मुखिया की भूमिका राजा की तरह ही है।'' भारत में मानवाधिकार की शुरूआत के बारे में आम सहमत नहीं है। एक वर्ग का मानना है कि इसकी शुरूआत स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन के समय अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध चलाए गए आन्‍दोलन या अभियानों के तहत इसकी शुरूआत हुई, वहीं दूसरों का मानना है कि भारत का गौरवशाली इतिहास इस बात का साथी रहा है, जिनमें सहनशीलता, उदारता और दया भारतीय परम्‍परा के अभिन्‍न अंग रहे हैं। ऐसा सिर्फ भारत में होता आया है अन्‍य देश तो केवल इसे आचरण में ढालने तक ही सीमित रहे परन्‍तु इसमें भी उन्‍हें सफलता नहीं मिली। प्राचीनकाल से हमारा धर्म एवं संस्‍कृति दूसरे देशों की संस्‍कृतियों एवं धर्मों को आदर एवं सम्‍मान की दृष्‍टि से देखता रहा है। हमारी वैदिक सभ्‍यता में सहनशीलता और दूसरों के प्रति आस्‍था का सम्‍मान करते हुए इसमें मानव अधिकार के संरक्षण की परम्‍परा रही है। तथापि संहिताबद्ध कानून तथा न्‍याय में मानव अधिकार को अनिवार्य बाध्‍यता के रूप में स्‍थान नहीं दिया गया था। यद्यपि एक विकसित न्‍याय व्‍यवस्‍था का अस्‍तित्‍व था, किन्‍तु कोई मानव अधिकार घोषणा पत्र नहीं था। हिन्‍दू धर्म, बौद्ध धर्म तथा अशोक के शिलालेखों पर उत्‍कीर्ण दार्शनिक आध्‍यात्‍मिक और धार्मिक विचारों में मानव-अधिकार के पुट व्‍याप्‍त थे। मौलिक अधिकारों की मान्‍यता स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन के दौरान की गई। यह संघर्ष मूलरूप से नागरिक एवं मानवाधिकारों को कुचलने के विरूद्ध था। स्‍वतंत्रता संघर्ष के दौरान चले स्‍वराज (भारतीय शासन) आन्‍दोलन लाखों भारतीयों में आत्‍म चेतना जगाने तथा उन्‍हें नैतिक एवं वैधानिक रूप से सजग बनाने का प्रयत्‍न था।

आजादी के पश्‍चात भारतीय संविधान में नागरिकों के अधिकारों को सुनिश्‍चित करने के लिए ठोस प्रावधान बनाए गए तथा उन्‍हें न्‍याय, स्‍वतंत्रता, समानता और बन्‍धुत्‍व का दर्जा प्रदान किया गया।

भारतीय एवं वैश्‍विक परिप्रेक्ष्‍य में देखने पर मानव अधिकार की विभिन्‍न समस्‍याएं दृष्‍टिगोचर होती हैं, जिनमें प्रमुख नस्‍लीय भेदभाव, धार्मिक अधिकार, भाषाई अधिकार, लिंगभेद, पुलिस अत्‍याचार आदि जो मौलिक अधिकारों के उल्‍लंघन के कारण उत्‍पन्‍न हुई हैं। वर्तमान के युग में मानव अधिकार उल्‍लंघन की कई घटनायें घटित हो रही हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में दलितों पर अत्‍याचार, बड़ी परियोजनाओं के कारण लोगों के विस्‍थापन, प्राकृतिक आपदा (चक्रवात, सूखा इत्‍यादि) से प्रभावित लोगों की मूलभूत सुविधा उपलब्‍ध कराने सम्‍बन्‍धी कमी की समस्‍या, बच्‍चों के साथ अमानवीय बर्ताव, बच्‍चों की वेश्‍यावृत्‍ति के लिए बाध्‍य करना (विशेषकर दिल्‍ली, कर्नाटक और उड़ीसा में) कई राज्‍यों में आतंकवादी गतिविधियों, जेल में बलात्‍कार तथा उत्‍पीड़न, महिला हिंसा, बंधुआ मजदूरी, अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति किया जाने वाला अत्‍याचार एवं धार्मिक सहिष्‍णुता के प्रश्‍न जुड़े हुए हैं।

द्वितीय विश्‍वयुद्ध के पश्‍चात मानव अधिकारों के प्रति विश्‍व समुदाय की चिन्‍ता लाजिमी थी और भारत का स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन इस बात का जीवंत उदाहरण है, जिसमें नागरिक अधिकार एवं मानव अधिकारों के लिए ही लड़ाई लड़ी गयी। पं․ जवाहर लाल नेहरू ने स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन के पहले ही इन मानव सम्‍बन्‍धी अधिकारों का प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया था। पं․ जवाहर लाल नेहरू की निस्‍वार्थ भावना और निष्‍ठा से इस दिशा में प्रगति हुई और उत्तरोत्तर विकास की प्रक्रिया से गुजरते हुए राष्‍ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्‍थापना सन्‌ 1993 में की गई। यह राष्‍ट्रीय मानव अधिकार आयोग मानव अधिकारों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए हमारी चिन्‍ता का प्रतिफल है। इसका गठन मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1933 के अधीन किया गया, जो 28 सितम्‍बर 1993 से अस्‍तित्‍व में आ गया। जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य इसका अपवाद है। यह अधिनियम इस राज्‍य के उन्‍हीं विषयों पर लागू होता है, जिनकी चर्चा सूची 1 से 3 तक तथा अनुसूची टप्‍प्‍प्‍ में है। इस अधिनियम में आयोग को वैधानिक दर्जा मिलने के साथ-साथ यह भारत में मानव अधिकार के संरक्षण तथा संवर्द्धन का आधार तैयार करता है। मानव अधिकार अधिनियम 1993 की धारा (30) में मानव अधिकार हनन से जुड़े मामलों की शीघ्र जांच तथा न्‍याय दिलाने के लिए मानव अधिकार न्‍यायालयों के गठन का प्रावधान है। इसके साथ ही आयोग निम्‍न कार्य निष्‍पादित करेगा -

* घटना से पीड़ित व्‍यक्‍ति के द्वारा दायर याचिका पर जांच करेगा साथ ही उसे यह भी जांच करने का अधिकार है कि लोक सेवक द्वारा कहाँ तक ढिलाई की गई है।

* मानव अधिकार को हनन करने वाले आतंकवाद सहित अन्‍य कारकों की समीक्षा करेगा। इसको समाप्‍त करने के उपचार भी करेगा।

* समाज के विभिन्‍न वर्गों में मानव अधिकार के प्रति सजगता फैलाएगा। वह प्रकाशनों, मीडिया तथा सेमिनारों के माध्‍यम से मानव अधिकार संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाएगा।

* मानव अधिकार के क्षेत्र में कार्यरत गैर सरकारी संगठनों तथा अन्‍य संस्‍थाओं को प्रोत्‍साहित तथा मानव अधिकार सम्‍बन्‍धी अन्‍तर्राष्‍ट्रीय घोषणाओं और रूचियों की समीक्षा करेगा तथा उनके प्रभावी क्रियान्‍वयन के लिए उपाय सुझाएगा। मानवाधिकार पर शीघ्र कार्य को प्रोत्‍साहित करेगा।

* किसी न्‍यायालय में मानव अधिकार उल्‍लंघन का मामला दर्ज हो तो उस न्‍यायालय के अनुमोदन से मामले में हस्‍तक्षेप करेगा। साथ ही राज्‍य सरकार को सूचित कर राज्‍य सरकार द्वारा संचालित किसी उपचार स्‍थल शिविरों एवं अन्‍य संस्‍थानों में जहाँ लोगों को रखा गया है, उनकी स्‍थिति जाँचने के लिए पहुँच सकता है।

थ्‍ मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए संवैधानिक प्रावधान अथवा किसी कानून की समीक्षा कर सकता है और उसे प्रभावी बनाने के लिए सुझाव दे सकता है।

ऐसी परिस्‍थितियों में आयोग कार्य करते हुए अपना दृष्‍टिकोण रखता है और इसके कार्यों का उल्‍लंघन करने पर उसे निम्‍न अधिकार प्राप्‍त हैं -

1908 की सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत आयोग को सिविल न्‍यायालय की शक्‍ति प्राप्‍त है, जिसके तहत आयोग गवाह के खिलाफ सम्‍मन जारी कर सकता है। साक्ष्‍य खोजने और संरक्षण का अधिकार के साथ शपथनामा (प्रमाणपत्र प्राप्‍त करने) सार्वजनिक रिकार्ड प्राप्‍त करने, किसी न्‍यायालय से कागजात प्राप्‍त करने इत्‍यादि के अधिकार इसके पास हैं। आयोग अथवा आयोग द्वारा प्राधिकृत व्‍यक्‍ति किसी भवन में प्रवेश कर सकता है, उसे साक्ष्‍य को जब्‍त करने और उसकी प्रति प्राप्‍त करने का अधिकार है। साक्ष्‍य एवं गवाहों की तहकीकात के पश्‍चात संतुष्‍ट होने पर वह मामले को दण्‍डाधिकारी को सुपुर्द करने का अधिकार रखता है। आयोग के समक्ष कोई भी कार्यवाही, न्‍यायिक कार्यवाही मानी जायेगी।

भारत के राज्‍यों में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21 में राज्‍य में मानवाधिकार आयोग गठन का प्रावधान है और राज्‍यों में इसके गठन की प्रक्रिया तेजी से बढ़ रही है। इन आयोगों के वित्‍तीय भार का वहन राज्‍य सरकारों द्वारा किया जाता है। सम्‍बन्‍धित राज्‍य का राज्‍यपाल, अध्‍यक्ष तथा सदस्‍यों की नियुक्‍ति करता है। आयोग का मुख्‍यालय राज्‍य में कहीं भी हो सकता है।

सन्‌ 1993 की धारा 21 (5) के तहत राज्‍य मानव अधिकार के हनन से सम्‍बन्‍धित उन सभी मामलों की जांच कर सकता है, जिनका उल्‍लेख भारतीय संविधान की सूची में किया गया, वहीं धारा 36 (9) के अनुसार आयोग ऐसे किसी भी विषय की जांच नहीं करेगा, जो किसी राज्‍य आयोग अथवा अन्‍य आयोग के समक्ष विचाराधीन है।

राष्‍ट्रीय एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर यह बात स्‍वीकार की गई है कि मानवाधिकार के बिना धारणीय विकास सम्‍भव नहीं है, किन्‍तु यहाँ लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि विकास के बिना मानव अधिकार में संवर्द्धन भी नहीं हो सकता है, इसके लिए विवेक सम्‍मत विधान और सशक्‍त समाज की आवश्‍यकता है, किन्‍तु देखा जाए तो ये अपने आपमें पूर्ण नहीं है। मानव अधिकार को अवधारणा एवं निर्माण की दृष्‍टि से देखा जाये तो इसे सरकार एवं संगठित लोगों ने बनाया है वे स्‍वतः नहीं मिलते क्‍योंकि सार्वजनिक सेवा का लाभ समाज के गरीब वर्गों को तभी मिलता है, जब सरकार उसे प्रदान करने में सक्षम होती है और ऐसा तभी होता है, जब वहाँ का शासन भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त होता है। बालश्रम को तभी समाप्‍त किया जा सकता है, जब समाज की आर्थिक परिस्‍थिति ऐसी हो, जिसमें बच्‍चे माता-पिता की आय पर आश्रित हों तथा सक्षम न्‍याय प्रणाली द्वारा कानूनी प्रावधानों का पालन होता हो। वियना में आयोजित मानवअधिकार सम्‍मेलन में प्रत्‍येक मानव को समान महत्‍व दिया गया। संयुक्‍त राष्‍ट्र चार्टर में सर्वप्रथम बहुउद्देशीय मानव अधिकार संधि की चर्चा की गई। संयुक्‍त राष्‍ट्र, चार्टर में मानव अधिकार की घोषणा प्रस्‍तावना-अनुच्‍छेद 1, 13 अनुच्‍छेद 55, अनुच्‍छेद 68, अनुच्‍छेद 76 में है। इसके प्रस्‍तावना में कहा गया ‘‘हम संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के लोग भावी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए कृत संकल्‍प हैं। हमने अपने जीवन काल में मानव समुदाय को दो बार इन विभीषिकाओं से उत्पीड़ित होते देखा है। हम मौलिक अधिकार गरिमा और मानव मूल्‍य में विश्‍वास व्‍यक्‍त करते हुए स्‍त्री-पुरूष के समान अधिकारों तथा छोटे-बड़े राष्‍ट्रों को एक दृष्‍टि से देखने का प्रयास करेंगे। इस घोषणा के अनुच्‍छेद 30 में नागरिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक अधिकार प्रदान करने की बात कही गई है। इस प्रकार 1948 का घोषणा पत्र स्‍वतंत्रता के क्षेत्र में सभी राष्‍ट्रों को समान मानदंड उपलब्‍ध कराता है। इस घोषणा के अनुच्‍छेद (1) में कहा गया है कि सभी मनुष्‍य जन्‍म से समान हैं तथा वे अधिकार एवं गरिमा में बराबर हैं।'' मानव को सभी के साथ तर्कयुक्‍त एवं विवेकपूर्ण व्‍यवहार करना चाहिए। उन्‍हें दूसरों के साथ विनम्र एवं मातृत्‍वपूर्ण आचरण करना चाहिए। मानव अधिकार सम्‍बन्‍धी वैधानिक रूप से बाध्‍य करने वाले दो अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मसौदे तथा नागरिक एवं राजनैतिक अधिकार से सम्‍बन्‍धित समझौते को 23 मार्च, 1976 को कार्यान्‍वित किया गया। इन दोनों घोषणाओं के आधार पर भारत ने अपना मानव अधिकार सम्‍बन्‍धी घोषणा पत्र तैयार किया।

वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य की जब हम बात करते हैं तो आज मानव अधिकार की अवधारणा महत्‍वपूर्ण हो गयी है। मानव अधिकार आन्‍दोलन की उपादेयता तभी है, तब समाज के सभी नागरिकों को मानव अधिकार उपलब्‍ध हों। मानव अधिकार का मूल मकसद (अवधारणा) यह होना चाहिए कि समाज से सभी प्रकार के भेदभाव का अन्‍त हो। वर्तमान राजनैतिक तंत्र राष्‍ट्रीय लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में सक्षम नहीं हो पा रहा है। भारत के संदर्भ में जिन मूल्‍यों के आधार पर स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन चलाया गया, उसकी अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। वे मूल्‍य विश्‍लेषण और विकास के लिए उचित ढ़ांचा प्रदान करते हैं। वर्तमान में पाश्‍चात्‍य विचारों के समागम ने मानव चेतना को झकझोर दिया है। भारत ने सभी उत्‍तम विचारों को विवेकपूर्ण दृष्‍टि से स्‍वीकार करते हुए एक राजनैतिक तंत्र विकसित किया है और संविधान निर्माता यह महसूस करते थे कि बुनियादी मानवाधिकार के बिना प्राप्‍त की गई स्‍वतंत्रता बेमानी है। इसलिये भारतीय संविधान में मानवाधिकारों को वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।

नागरिक स्‍वतंत्रता के लिए भारत के कर्णधारों ने प्रारम्‍भ से ही ध्‍यान देना शुरू कर दिया था और इसी के तहत भारत में मानव अधिकारों को शुरू से ही महत्‍व दिया जाता रहा है। किन्‍तु हाल के वर्षों में भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में मुम्‍बई दंगे, गुजरात के दंगे, तमिलनाडु एवं उड़ीसा में झींगा की खेती, गोधरा काण्‍ड, संसद पर हमला, उड़ीसा में पुलिस हिरासत में सुमन बेहरा को बंधक बनाकर रखने की घटना एवं सार्वजनिक रूप से महिलाओं की हत्‍या, हिंसा जैसी घटनाएं मानवाधिकार के हनन के साक्ष्‍य हैं। इससे मानवाधिकार के फलक में विस्‍तार हो रहा है। हमारे भारतीय समाज की लगभग आधी आबादी गरीबी में जीवन व्‍यतीत कर रही है। आधे निरक्षरता के अंधकार में डूबे हुए हैं। शोषण के कारण समाज का एक बड़ा समूह उत्पीड़ित है अर्थात्‌ मानव गरिमापूर्ण जीवन नहीं व्‍यतीत कर रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता अक्‍सर उत्‍पीड़न, बर्बरता, अमानवीय व्‍यवहार और क्रूरता का प्रश्‍न उठाते हैं किन्‍तु वे भूल जाते हैं कि घोर दरिद्रता के कारण लोग किस प्रकार दयनीय जीवन-यापन व्‍यतीत कर रहे हैं। लोगों को मानव अधिकार के प्रति सचेत तथा इससे सम्‍बन्‍धित समस्‍याओं के समाधान के लिए क्‍या कुछ उपाय होने चाहिए यह शोध का केन्‍द्र बिन्‍दु है।

देश में आबादी के साथ-साथ उत्‍तर प्रदेश न सिर्फ मानवाधिकारों के हनन के मामलों में सबसे आगे हैं, बल्‍कि पूरे देश में इन मामलों की दर्ज शिकायतों में से आधे से अधिक इस राज्‍य से हैं। राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग की 15 अप्रैल 2008 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, मानवाधिकार के हनन के मामले में उ․ प्र․ के बाद देश की राजधानी दिल्‍ली का नम्‍बर आता है। ‘‘मानवाधिकार हनन के राष्‍ट्रीय आयोग में दर्ज 60 फीसदी मामले उ․ प्र․ के हैं। राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग की हाल की (2005-2006) की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 74444 मामलों में से अकेले 44560 मामले उ․ प्र․ के हैं यह शर्मनाक स्‍थिति है। दिल्‍ली के 5027, बिहार के 4545, हरियाणा के 3000, राजस्‍थान के 2500, उत्‍तराखण्‍ड के 1789 मामले दर्ज हैं। लक्ष्‍यद्वीप से एक भी शिकायत नहीं आयी है।''

रिपोर्ट में कहा गया है कि नागालैण्‍ड ऐसा राज्‍य है जहाँ इस सम्‍बन्‍ध में सबसे कम केवल दो मामले दर्ज किए गये। सिक्‍किम और दादरा नगर हवेली में मानव अधिकारों के हनन से सम्‍बन्‍धित पाँच-पाँच मामले दर्ज किये गये।

हाल के वर्षों में मानवाधिकार के हनन के सबसे अधिक मामले महिलाओं से सम्‍बन्‍धित हैं, क्‍योंकि वर्तमान में भारतीय महिलाएं समाज एवं राज्‍य की विभिन्‍न गतिविधियों में पर्याप्‍त सहभागिता कर रही हैं। परन्‍तु इससे उनके प्रति घरेलू हिंसा के अलावा कार्यस्‍थल पर सड़कों एवं सामाजिक यातायात के माध्‍यमों में एवं समाज के अन्‍य स्‍थलों पर होने वाली हिंसा में भी वृद्धि हुई है। इसमें शारीरिक, मानसिक एवं यौन सभी प्रकार की हिंसा सम्‍मिलित है।

सन्‌ 1997-98 की रिपोर्ट देखने पर स्‍पष्‍ट होता है कि देश भर के 26 राज्‍यों में मानवाधिकार उल्‍लंघन की कुल 35779 शिकायतें प्राप्‍त हुई, जिससे 17453 सिर्फ उत्‍तर प्रदेश के थे। राष्‍ट्रीय महिला आयोग के अनुसार उ․ प्र․ में महिला उत्‍पीड़न के कुल 18929 मामले दर्ज हुए (2001) जो देश में महिलाओं से जुड़े अपराधों का 13․4 प्रतिशत हैं। इसमें 31․8 प्रतिशत दहेज हत्‍याएं हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार उत्‍तर प्रदेश में 16 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के प्रति हिंसा के सन्‌ 2003 में पंजीकृत मामले हैं - प्रताड़ना (30․4 प्रतिशत), छेड़छाड़ (25 प्रतिशत), अपहरण (12 प्रतिशत), बलात्‍कार (12․8 प्रतिशत), भ्रूण हत्‍या (6․7 प्रतिशत), यौन उत्‍पीड़न (4․90 प्रतिशत), दहेज मृत्‍यु (4․6 प्रतिशत), दहेज निषेध (2․3 प्रतिशत) व अन्‍य (6 प्रतिशत)। वैसे तो यह अपराध पूरे राष्‍ट्रीय स्‍तर पर होते हैं, पर इनमें उत्‍तर प्रदेश सबसे आगे हैं। महिलाओं के विरूद्ध अपराधों में आधे से कुछ अधिक अपराधों में आधे से कुछ अधिक अपराध (56․70 प्रतिशत)। केवल पाँच राज्‍यों में होते हैं।

मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा ने भेदभाव को न करने के सिद्धान्‍त की पुष्‍टि की थी और घोषित किया था कि सभी मानव स्‍वतंत्र पैदा हुए हैं और गरिमा एवं अधिकारों में समान है तथा सभी व्‍यक्‍ति बिना किसी भेदभाव के, जिसमें लिंग पर आधारित भेदभाव भी शामिल है, सभी अधिकारों एवं स्‍वतंत्रता के हकदार हैं। फिर भी महिलाओं के विरूद्ध अत्‍यधिक भेदभाव होता रहा है, थोड़ा पीछे चलें तो सर्वप्रथम 1946 में महिलाओं की प्रास्‍थिति पर आयोग की स्‍थापना की गई थी। महासभा ने 7 नवम्‍बर, 1967 को महिलाओं के विरूद्ध सभी प्रकार के भेदभाव की समाप्‍ति पर अभिसमय अंगीकार किया गया। सन्‌ 1981 एवं 1999 में यौन-शोषण एवं अन्‍य दुख से पीडित महिलाओं को सक्षम बनाने की व्‍यवस्‍था की गई।

संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा प्रायोजित अन्‍तर्राष्‍ट्रीय महिला दशक (1976-1985) के दौरान महिलाओं के तीन सम्‍मेलन हुए। चौथा सम्‍मेलन वर्ष 1995 में बीजिंग में हुआ, जिसके द्वारा महिलाओं के सम्‍बन्‍ध में बहुत अधिक जानकारी हुई है और जो राष्‍ट्रीय महिला आन्‍दोलनों एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय समुदाय के बीच अमूल्‍य घड़ी का आधार बना। मानवाधिकार संरक्षण कानूनों एवं राष्‍ट्रीय महिला आयोग के गठन से नारी की समाज में स्‍थिति कुछ सुदृढ़ हुई है। अब महिला उत्‍पीड़न की घटनाओं में अपेक्षाकृत कमी आयी है। लेकिन यह बुन्‍देलखण्‍ड क्षेत्र में क्‍या है ? शोध का प्रश्‍न है ?

स्‍टेट ऑफ राजस्‍थान, ए․ आई․ आर․ 1997 एम․ सी․ 3011 मामला कामकाजी महिलाओं के यौन उत्‍पीड़न से सम्‍बन्‍धित है। इस मामले में उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा कामकाजी महिलाओं के साथ यौन उत्‍पीड़न की घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रमुख दिशा निर्देश जारी किए जिसमें यौन शोषण प्रमुख है। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता 1860 में भी महिलाओं के विरूद्ध किए गए अपराधों के लिए कठोर दंड की व्‍यवस्‍थाएं की गई हैं। धारा 354 में स्‍त्री की लज्‍जा, धारा 66 में अपहरण, धारा 376 में बलात्‍कार, धारा 398-क में निर्दयतापूर्ण व्‍यवहार तथा धारा 509 व 410 में स्‍त्री का अपमान करने को दण्‍डनीय अपराध घोषित किया गया। दहेज की मांग की विभीषिका से नारी की रक्षा करने हेतु दहेज निषेध अधिनियम 1991 पारित किया गया है। सती निवारण अधिनियम 1957 में सती प्रथा के निवारण हेतु कठोर दंड की व्‍यवस्‍था की गई है। ओंकार सिंह बनाम स्‍टेट ऑफ राजस्‍थान 1955 के मामले में इस अधिनियम को संवैधानिक घोषित किया गया है। भारतीय हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम सन्‌ 1956 की धारा 18 स्‍त्रियों की सम्‍पत्ति में मालिकाना हक प्रदान करता है। श्रम कानून महिलाओं के लिए संकटापन्‍न स्‍थिति तथा रात्रि में कार्य का निषेध करते हैं। मातृत्‍व लाभ अधिनियम कामकाजी महिलाओं को प्रसूति लाभ की सुविधाएं प्रदान करता है। दण्‍ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में उपेक्षित महिलाओं के भरण-पोषण का प्रावधान किया गया है। देवेन्‍द्र सिंह बनाम जसपाल कौर ए․ आई․ आर․ - 1999 पंजाब एण्‍ड हरियाणा 229 बाद में उच्‍चतम न्‍यायालय ने अभी निर्धारित किया कि विवाह शून्‍य एवं उत्‍कृष्‍ट घोषित हो जाने पर भी पत्‍नी हिन्‍दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 25 के अन्‍तर्गत भरण-पोषण पाने की हकदार होती है। देश के संविधान में 12वें संशोधन द्वारा अनुच्‍छेद 21 क(ङ) के अन्‍तर्गत जारी सम्‍मान के विरूद्ध प्रथाओं को समाप्‍त करने का आदेश अंगीकृत किया गया है। इस प्रकार स्‍पष्‍ट है कि नारी विषयक मानवाधिकारों की विभिन्‍न एवं न्‍यायिक निर्णयों में पर्याप्‍त संरक्षण प्रदान किया गया है। वर्तमान समय में यह कहाँ तक परिलक्षित होता है ? शोध का प्रश्‍न है।

इतना सब कुछ होने के बाद आज महिलाओं के प्रति विश्‍वव्‍यापी हिंसा की घटनाएं बदस्‍तूर जारी हैं, जिससे कोई भी समुदाय, समाज एवं देश मुक्‍त नहीं है। महिलाओं के प्रति भेदभाव इसलिए विद्यमान हैं क्‍योंकि इसकी जड़ें सामाजिक प्रतिमानों एवं मूल्‍यों में जमीं हुई हैं और वे अन्‍तर्राष्‍ट्रीय करारों के परिणामस्‍वरूप परिवर्तित नहीं होते हैं, वैसे तो महिलाओं के विरूद्ध हिंसा के कारणों को समाप्‍त किए बिना उसका पूर्ण निदान संभव नहीं पर यदि पाश्‍चात्‍य एवं विकसित देशों पर दृष्‍टिपात करें तो ऐसा लगता है कि इसका कारण मानवीय संरचना ही है।

भारतीय परिप्रेक्ष्‍य में विशेषकर उ0 प्र0 में मानवाधिकारों के प्रति आम जनता में जागरूकता का अभाव सा परिलक्षित होता है। यह विशेष रूप से बुन्‍देलखण्‍ड के क्षेत्र में और भी महत्‍वपूर्ण हो जाता है। यहाँ शोषण, अन्‍याय, उत्‍पीड़न, अत्‍याचार लोगों के अधिकारों का हनन आदि सामान्‍य रूप से प्रचलित हैं। शहरी संस्‍कृति की विकृतियों के कारण आज भी भारत के किसी भी कोने में किसी भी महिला के साथ जो बिना अंगरक्षकों के चलती है, उनके साथ किसी भी समय कुछ भी घटित हो सकता है और इसके लिए जरूरी नहीं कि अपराधी पकड़ा ही जाए।

निष्‍कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि मानव अधिकारों को प्रोत्‍साहित करने के लिए तथा भविष्‍य में मानव अधिकारों के उल्‍लंघन को रोकने के लिए यह नितान्‍त आवश्‍यक है कि अन्‍तर्राष्‍ट्रीय विधि प्रणाली को और भी अधिक प्रभावी बनाया जाए नहीं तो केवल आदेश और निर्देश जारी कर देने भर से कुछ बनने वाला नहीं, जब तक मानवाधिकार के मुख्‍य नियम एवं लोगों में जागरूकता सम्‍बन्‍धी निर्देशों के पालन की दिशा में हम सचेष्‍ट नहीं होंगे तब तक जुल्‍म का यह सिलसिला चलता रहेगा और यूँ ही सूली पर लटका रहेगा मानवाधिकार।

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युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके पांच सौ से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍याओं को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानों से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।



सम्‍पर्क ः वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग, डी0 वी0(पी0 जी0) कालेज उरई, जालौन उ0 प्र0 285001 , भारत


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विषय: आलेख


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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यज्ञों का महत्व एवं उपयोगिता


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यज्ञों का महत्व एवं उपयोगिता
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डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव
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भारतीय जनमानस में ऐतिहासिक एवं पौराणिककाल से यज्ञों का अपना विशिष्ट उपयोग एवं महत्व रहा है। हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति में यज्ञसें का हर समय उपयोग किया जाता था अर्थात् हमारी संस्कृति अतीत में यज्ञमय प्रतीत होती है। पौराणिक ब्राह्यण ग्रन्थों में तो यज्ञ का सम्पूर्ण साम्राज्य ही दिखता प्रतीत होता है। यही कारण है कि शतपथ ब्राह्यण में स्पष्ट रूप से लिखित है "यज्ञोवैश्रेष्ठतमं कर्म" अर्थात् समस्त कर्मों में से यज्ञ श्रेष्ठ कर्म है। जहाँ एक ओर ब्राह्यण ग्रन्थ यज्ञ की इतनी विशेषताएं एवं महिमा समझते है जिनका मानना है कि वह ब्रह्या को ही यज्ञ स्वरूप् बताते है। हमारे जगत में जो कुछ सामान्यरूप् से दिखता है वह यज्ञों का ही प्रत्यक्ष रूप् अवलोकित होता है वहीं दूसरे शब्दों में कहें तो यज्ञ ही प्रजापति हे, वहीं दूसरी तरफ यज्ञ शब्द परमात्मा की उपासना और मनुष्य की त्याग भावना का साक्षत प्रतीक बन गया है क्योंकि इनका सर्वांगपूर्ण विवेचन वंदों तथा ग्रहसूत्रों की सहायता से भी प्राप्त होता है।
भारतीय जीवन में यज्ञों द्वारा ही मनुष्य समाज और विभिन्न समूहों की उत्पत्ति हुई, इसके साथ ही यज्ञों द्वारा मनुष्य केवल अपने ही जीवन के अभिप्राय के ही पूर्ति नही करता वरन् सम्पूर्ण जनमानस में अनेक रूपों का समन्वय करता हुआ उसकी एकता संरक्षण एवं सुरक्षा साक्षात्कार करता है। शतपत ब्राह्यण में यज्ञ को प्रजापति माना गया है "एष वै प्रत्यक्षं यज्ञो यत्प्रजापतिः" अर्थात यह प्रजापति ही यज्ञ है संसार में जड़ जगत में जो भी यज्ञ हो रहे है , सूर्य उसका केन्द्र है अर्थात् जो यह वह यही सूर्य है इसी महायज्ञ का चित्र मानव इस वसुन्धरा पर बनाता है। वास्तव में देखा जाये तो वसुन्धरा की वेदी पर यज्ञ हो मुख्य केन्द्र बिन्दु है क्योंकि अग्नि देवताओं में प्रथम है और सूर्य अन्तिम। इसे विस्तारित रूप् से परिभाषित करें तो यह कहा जा सकता है कि वेदसें में जो अग्नि दिखती है उसे ही हावि के रूप् में जाना जाता है! वास्तव में देखा जाए तो यज्ञ केवल पदार्थों को ही शुद्ध नहीं करता बल्कि इन पदार्थों , पर्यावरण तथा सकल जगत को शुद्ध करता हुआ मनुष्य मात्र का कल्याण करता है। यज्ञों के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से दो तरह के लाभ दिखाई देते है। प्रथम के तहत यज्ञ कत्र्ता को सृष्टि नियम का ज्ञान साक्षात एवं समान रूप से होता प्रतीत होता है। दूसरे के तहत सृष्टि नियम में यह यज्ञ परोक्ष रूप् से मदद करते है। जिस तरह से सूर्य अपने बल से इस संसार की दुर्गन्धि को दूर करता है , और जल को पवित्र करता है। उसी तरह से मानव द्वारा किए गये अग्निहोत्र भी दोनो काम करते है।
भूमण्डलीकरण एवं ग्लोबल वार्मिंग के इस युग में आज यज्ञों का महत्व इसलिए अधिक बढ़ गया है क्योंकि यज्ञों के द्वारा दी गई आहुति वायु के माध्यम से सूर्य की ओर अर्थात् ऊपर (वायुमण्डल) की ओर जाती है। यह सामग्री ऊपर जाकर सम्पूर्ण अन्तरिक्ष में फैल जाती है। अन्तरिक्ष में फैले प्रदूषण को यह समाप्त कर सूर्य के प्रभाव से मेघमण्डल के साथ वह छवि नीचे उतरती है और सभी मानव , प्शु,पक्षियों एवं पर्यावरण को तृप्त कर पवित्र बनाती है उसकी यह आहुति हवा (वायु) के साथ देश-देशान्तर को शुद्ध करती हुई अपनी अपहिश दुर्गधि आदि के दोषों को निर्धारित करती हुई सम्पूर्ण जगत के प्राणियों को सुख प्रदान करती है। इसमे कोई दो राय नहीं (कर्मकाण्ड एवं पुजा पाठ को छोड़कर देखें तो) यज्ञ के द्वारा पृथ्वी के पदार्थ एवं अन्तरिक्ष शुद्ध होता है साथ ही सूर्य की किरणें भी पवित्र होती हैं। वास्तव में देखे तो यज्ञ इन पदार्थों को ही शुद्ध नहीं करता बल्कि मनुष्य सहित समूह सम्पूर्ण प्राणी जगत का मानसिक रूप से सबलकर कल्याण भी करते हैं।
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सम्पर्क-
वरिष्ठ प्रवक्ता हिन्दी विभाग
डी0 वी0 महाविद्यालय , उरई (जालौन) उ0 प्र0 -285001

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डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव का परिचय यहाँ देखें।

Saturday, January 31, 2009

लघुकथा की प्रासंगिकता एवं उपादेयता

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12.14.2008

लघुकथा की प्रासंगिकता एवं उपादेयता
डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
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आर्थिक उदारीकरण, ग्लोबलाइजेशन अर्थात् एक ध्रुवीय होती दुनिया के इस वर्तमान भौतिकवादी युग में किश्त-किश्त जीवन जीता आदमी व्यक्तिगत जिजीविषा की पूर्ति हेतु दिनोंदिन आदमी नहीं, मशीन बनता जा रहा है। वह समय को अपना उत्पादक बनाकर बहुत ही चालाकी से उसका व्यापार कर रहा है, वास्तविकता यह है कि ऐसे समय में जब दुनियां की मण्डी में समय की कलाबाजी हो रही है, मनुष्य अपना समय निःस्वार्थ नष्ट नहीं कर सकता। इसलिए पेशेवर साहित्यधर्मियों एवं पाठकों को छोडकर शेष लोग अपनी मानसिक थकान मिटाने हेतु कुछ ऐसा पढ़ना या समझना चाहते हैं, जिसमें समय कम लगे और उन्हें उसका प्रतिफल पर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर सकें। साथ ही उसके ग्रहण करने एवं समझने का दायरा दर्पण की तस्वीर की तरह पारदर्शी भी हो। आज लघुकथाओं की यही सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता भी है।

लघुकथाकार अनावश्यक कथा विस्तार, वर्णनात्मक फैलाव और विलगाव से बचता हुआ जीवन के छोटे घटना प्रसंग संवेदनाओं के माध्यम से व्यक्त करता है। विधा के रूप में जिस तरह साहित्य के गद्य रूप की कथा विधाएँ-उपन्यास एवं कहानी होती है, उसी तरह लघुकथा इन्हीं तत्वों के परिप्रेक्ष्य में लिखी जाती हैं। इन तीनों उपविधाओं में अन्तर मात्र कथानकों का होता है जिसके कारण इन तीनों में स्वतः ही आकारगत अन्तर आ जाना लाजमी है। इन्हीं प्रमुख बिन्दुओं पर इसका शिल्प केन्द्रित होता है, अब वह शिल्प चाहे पारम्परिक हो, प्रयत्न साध्य हो या स्वयंभू हो। जहाँ तक लघुकथा की पृथक पहचान का सवाल है, एक तो कथानक को लेकर आकारगत इसकी अपनी पृथक पहचान हैं तो दूसरी ओर हृदय में गहरे पैठकर मार करने की इसकी क्षमता विशेष पहचान रखती है। या यूँ कहा जाये कि “लघु कथा युगबोध को अभिव्यक्त करती है और नैतिक जीवनमूल्यों और नैतिक जीवनमूल्यों की राख के अन्दर कुरेदती हे। वह आलपिन की चुभन भी है और गन्ध की छुअन भी है। दरअसल लघुकथा की अनिवार्य शर्त रूप में न होकर गुण में है, शिक्षा में न होकर संस्कार में है दृश्य में न होकर प्रभाव में है, स्वास्थ्य में न होकर व्यक्तित्व में है और व्यक्तित्व कर्म से बनता है, कसरत से नहीं।”

लघुकथा अपनी वैचारिक प्रक्रिया के द्वारा आश्रय के मन में एक भावनात्मक रूप ग्रहण करती है, जिसके भीतर उद्‌बोधित शोक, मानवीय शोषण, गरीबी, उत्पीड़न, असहायता के प्रति करुणा अर्थात् मानव को त्रासद परिस्थितियों से मुक्त कराने के भाव से सराबोर हो उठता है, जिसके कारण आश्रय के मन में साहस का एक ऐसा नया भाव जागृत हो उठता है जो बुराइयों, अन्धविश्वासों, रूढ़ियों, साम्राज्यवादियों, नीतियों के विरोध में संघर्ष और चुनौती का वीरतापूर्वक परिचय देने लगता है। सही अर्थों में देखा जाये तो लघुकथा की यही सत्योन्मुखी संवेदनशीलता है, जो शोषणविहीन समाज अर्थात् मंगलकारी तत्व की स्थापना करना चाहती है।

आकार की बात करें तो लघुकथा पंचतंत्र की बोधकथा की तरह आरम्भ होती है किन्तु बोध कथा का उद्देश्य केवल उपदेशात्मक होता था जबकि आधुनिक लघुकथा का लक्ष्य बहुआयामी है। तुलमात्मक दृष्टि से अवलोकर करें तो लघु कथाहास्य से थोड़ी दूर बनाकर चलती है, वहीं दूसरी ओर व्यंग्य के प्रति इसका सम्बन्ध घनिष्ट होता है। क्योंकि आज के विसंगति प्रधान समाज पर यह करारा प्रहार करती है।

लघुकथा में व्यंग्य का होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु व्यंग्य की उपस्थिति से लघुकथा में रोचकता आ जाती है। लघुकथा अपनी विशेषता से पाठक के मूड में जबर्दस्त परिवर्तन कर दे, साथ ही उसके मानस को कुछ सोचने पर विवश कर दे, उसमें वैचारिक विद्रोह का बीज बो दे। यह भी कहा जा सकता है कि लघुकथा एक पृष्ठ की गद्य सीमा में पूर्वजों सा प्राचीन या नवजात शिशु-सा ताजा कथानक, प्रत्यंचा से कसे हुए शब्द, फैशन के समान बन्धनहीन आकर्षक शैली और अन्त में कुछ करने अथवा बनने की ओर पाठक की तड़प का उद्देश्य लिए हुए हो। इन्टरनेटी युग मे सभी इसकी सार्थकता है।

लघुकथाओं की सर्जनात्मक शक्ति कहानी से किसी स्तर में कम नहीं मान जा सकती है। समसामयिक जीवन की विसंगतियों के विरुद्ध लघुकथाओं में जिस तीखेपन और वास्तविक रूप में विरोध/प्रतिरोध का स्वर गुंजित हुआ है, उससे इन लघुकथाओं की जीवन्तता की तस्वीर स्पष्ट दिखती है। इसके साथ ही अन्य सम्भावनाओं की आशा एवं प्रगति साफ दिखती है। वास्तव में मन के अंतःकोणों से लेकर विराट सामाजिक परिदृश्य को चित्रित करने में लघु कथाएँ निश्चय ही अपने नघु रूपबन्ध कहानी के अनुरूप दिखाई देती है।

लघुकथा सामाजिक विद्रूपताओं/विसंगतियों के विरुद्ध एक रचनात्मक आह्वान है। लघुकथा पाठकों को आज की आपा-धापी और समयाभाव के बीव जीवनानुभवों और यथार्थ के विविध सन्दर्भों आयामों का बोध कराती है। इन लघुकथाओं के माध्यम से रचनाकार उन जीवनपरिस्थितियों से परिचय कराता है जिनसे सम्पूर्ण मानवीय जीवन प्रभावित होता है। ये लघुकथाएँ कविता और गजलों की तरह सामाजिक, राजनीतिक और दैनिक जीवन की विसंगतियों/घटनाओं को विशिष्ट अन्दाज में वर्णन करती है। पढ़ने वाला इसके प्रति लगाव महसूस करने लगता है। वास्तविकता यह है कि लघुकथाओं में ’नावक‘ के मानक के समान सीमित शब्दों में बहुत कुछ कहने की असीमित शक्ति छिपी हुई है। उसमें व्यंग्य की पैनी धार है, आक्रोश के तीखे स्वर हैं, प्रतीकों और बिम्बों की सशक्त प्रयोगधर्मिता है, सारग्राहवाणी, है क्रान्तिधर्मी चेतना है, समूचे परिवेश को समेट लेने की अपरिमित क्षमता विद्यमान रहती है।

आज बाजारवाद ने लोकतंत्र को अभिजात्व वर्ग तक सीमित कर दिया है। आधुनिक भारत में पूँजीवाद के विकास के असंगत गति के परिणामस्वरूप ही सामाजिक, राजनीतिक विषमताओं जन्म हुआ। आजादी के बाद हमारे देश में पूँजीवादी व्यवस्था का शोषण चक्र जिस तीव्रता के साथ हुआ है उससे हमारे सामाजिक जीवन में अजीबोगरीब परिवर्तन हुए हैं। वर्गवादी और स्वार्थी सत्ता की राजनीति ने अब तक मानवीय मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है, जिससे मानव अमानवीय जीवन जीने के लिए विवश हुआ है। भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, स्मगलिंग, परिवारवाद, व्यक्तिवादी सोच को निरन्तर बढ़ावा मिलने के कारण सम्बन्धों में विघटन तेजी से आया है। व्यक्ति वर्गों और सम्प्रदायो में विभाजित हो गया है, वह उपभोक्ता संस्कृति का एक प्रोडक्ट बनकर रह गया है। साम्प्रदायिक, धार्मिक, आपराधिक राजनीति ने मनुष्य को असुरक्षा, भय और हिंसा के वातावरण में प्रवेश करने को मजबूर कर दिया है। अर्थशास्त्र की गणित के कारण रिश्वत, हिसां, लूट, बलात्कार तथा हत्या आदि को निरन्तर प्रश्रय मिल रहा है। नेता, अधिकारियों और पुलिस के त्रिगुट ने जहाँ अपने स्वार्थों की पूर्ति की है, वहीं मानव जीवन को प्रभावित/आतंकित भी किया है। इस पूँजीवादी व्यवस्था के पतनशील मूल्यों के कुप्रभाव के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की समस्या उत्पन्न हो गयी है। सूचना संचार के माध्यमों-प्रेस, पत्र, रेडियो, टेलिविजन द्वारा निरन्तर साहित्य-संस्कृति को क्षग्रिस्त करने का सफल-असफल प्रयास किया जा रहा है। पुलिस और नौकरशाही से तालमेल के कारण समाज में ऐसी घृणित घटनाओं का सृजन हो रहा है कि शर्म से सिर नीचा हो जाता है। इस तथ्य को प्रेस भी स्वीकार करता है। वोट बैंक, जातिवाद और राजनीति के कारण मानव मन, परिवार, गाँव, शहर और समूचे समाज में विघटन की सतत् प्रक्रिया जारी है। इक्कीसवीं सदी के हसीन सपनों में जीता हुआ व्यक्ति स्वतंत्रता, विकास, नई शिक्षा नीति के सुनहरे नारों के बीच आर्थिक संकट से उबरने के लिए भरपूर शक्ति से प्रयास कर रहा है। व्यवस्था की इन विसंगतियों और कुरूपताओं को यथार्थ अभिव्यक्ति देने में इन लघुकथाओं ने सशक्त और जारूक पेशकश की है। इनके माध्यम से पाठक प्रतिदिन के वातावरण में होने वाली घटनाओं एवं कशमकश से वाकिफ़ और रू-ब-रू होता है। दूसरी ओर वह उन परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार ताक़तों/शक्तियों को पहचानने में सफल होता है, जिसकी वजह से व्यक्ति का जीवन विसंगतिपूर्ण और अमानवीयता की ओर अग्रसर होता चला आ रहा है। लघुकथा का मूल अर्थ/तेवर मानवीय सहानुभूति का भाव एवं व्यवस्था में होने वाली सडांध का विरोध करना पड़ रहा है, जो इसकी सार्थकता को सिद्ध करता है।

हिन्दी लघुकथाओं के विकास में लघु पत्र/पत्रिकाओं की विशिष्ट भूमिका रही है क्योंकि इन पत्रिकाओं के माध्यम से ही लघुकथाओं की पहचान स्पष्ट हो सकती है। वास्तविकता यह है कि इन पत्रिकाओं के माध्यम से अपनी विकास यात्रा के दौरान इन लघुकथाओं ने उन ऊँचेऊँचे सोपानों को स्पर्श किया जिनके आधार पर ही कहानी केन्द्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। अपनी इस आत्म यात्रा में ही लघुकथाओं की लेखन परम्परा समृद्ध और प्रसिद्ध हुई है। सन् सत्तर के दशक में समकालीन विधाओं के बीच लघु कथा ने अपना एक स्वतंत्र वजूद बना दिया था। ’सारिका‘ जैसी महत्वपूर्ण कथापत्रिका ने लघुकथाओं के विशेषांक और महत्वपूर्ण अंकों को प्रकाशित कर लघुकथाओं के महत्व की स्वीकृति को सार्वजनिक किया है। वर्तमान समय में प्रत्येक पत्रिका में इस विधा के प्रति रुचि सम्पादकों का ध्यान आकृष्ट किए हुए हैं। हिन्दी आलोचकों ने अवश्य इस ओर अपनी उपेक्षा दृष्टि और संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है। समय-समय पर लघुकथाओं के विशेषांक, प्रदर्शनी तथा सेमिनारों के बढ़ते प्रभाव ने इसकी प्रासंगिकता सिद्ध की है।

स्पष्ट है कि आकार, तकनीक एवं शैली के आधार पर लघुकथा की अपनी पृथक पहचान बन चुकी है। लघुकथा का शिल्प परिणाम एवं विस्तार में प्रौढ़ता प्राप्त कर चुका है। इसलिए वर्तमान में लघुकथा के प्रति अनेक रचनाकारों का समर्थन और उत्साह अकारण नहीं है। जिस तीव्रता के साथ लघुकथा समृद्धता की ओर अग्रसर हो रही है, वह किसी भी साहित्य के लिए आश्चर्य का विशय हो सकता है। यह कहा जा सकता है कि लघुकथा विधा की स्थापना व्यावहारिक, शास्त्रीय और सैद्धान्तिक दृष्टि से अपनी स्वाभाविक व सहज विकास यात्रा के प्रखर सोपान पर है, जो इसकी सार्थकता, प्रासंगिकता एवं उपादेयता को सिद्ध करता है।


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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007
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डॉ. वीरेंद सिंह यादव

हिन्दी आज एक राष्ट्र की भाषा न रहकर विश्व भाषा के रूप में अपनी ख्याति अर्जित कर चुकी है। क्योंकि हिन्दी भूमण्डलीकरण के दौर में विश्व की सबसे सरल भाषा के रूप में अपना स्थान बनाने में सफल हुई है। इसका प्रमुख कारण यह है कि हिन्दी जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है यही नहीं विश्व की सबसे प्रचलित भाषाएं जो संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना स्थायी स्थान बनाये हुए हैं। (अंगरेज़ी, फ्रेंच, रूसी, चीनी, स्पेनिश और अरबी) इनकी भाषिक एवं वाचिक संरचना के आधार पर हमारी हिन्दी सबसे उत्कृष्ट है। भाषिक, वाचिक विशेषताओं की दृष्टि से हिन्दी ही विश्व की ऐसी भाषा है जो विस्तार एवम एक रूपकता की शक्ति रखती है। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया को देखें तो यह वास्तव में वास्कोडिगामा के समय से ही अस्तित्व में आ गयी थी। परन्तु इस प्रक्रिया के चलते जो परिवर्तन हमें परिलक्षित होते हैं उसका समर्थन करना जटिल सन्दर्भों पर निर्भर करता है। भूमण्डलीकरण की इस प्रक्रिया को आज भी कोई निश्चित ,निर्णायक राय नहीं मिल पायी है ? शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक क्षेत्रों को यदि हम छोड़ दें तो अन्य क्षेत्रों में भूमण्डलीकरण आज अपना दबदबा कायम किये हुए है। भूमण्डली करण के कारण हिन्दी का प्रभाव व्यावसायिकता पर स्पष्ट दिखने लगा है। वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो हिन्दी की पहचान तथा हिन्दी के प्रति रूचि विश्व में उत्तरोत्तर बढ़ रही है। अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में यदि हम देखें तो जितना हमरा देश में व्यावसायिक एवं वैधानिक दृष्टि से हिन्दी का विकास नहीं हुआ है उससे कहीं अधिक विकास विश्व में हिन्दी का हुआ है । और संयुक्त राष्ट्र संघ में जो भाषाएं स्थाई रूप से मान्यता प्राप्त किये हुए हैं उनमें हिन्दी को रखे जाने की माँग पर लगभग हर देश से इसे समर्थन मिलता शुरू हो गया है।



संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थाई मान्यता दिलाये जाने का प्रकरण आज कोई नयी बात नहीं है। हिन्दी को अधिकारिक भाषा के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ में सन् 1975 से ही प्रयास जारी हैं। क्योंकि सन् 1975 ई. में नागपुर में सम्पन्न प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव रखा गया । इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा एवं विश्व भाषा के मानकों में कहीं पीछे हो यह बात हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी सन् 1918 से पहले ही व्यक्त कर चुके थे। हाँ इस विश्व हिन्दी सम्मेलन से यह बात तो निश्चित हो गयी थी कि हिन्दी को जो स्थान मिलना चाहिए वह वैश्विक दृष्टि से उसे नहीं मिल पा रहा है। यह बात मॉरिशस के प्रथानमेंत्री सर शिवसागर राम गुलाम स्पष्ट कर चुके थे। इस सम्मेलन की यह विशेषता रही कि सभी ने एक स्वर से हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा के रूप में दर्जा दिलाने की पुरजोर वकालत की। भारतीय संसद में समय समय पर इस पर काफी तीखी बहसें एवं सुझाव पेश किये गये और तत्कालीन समय के प्रधानमेंत्रियों इंदिरा गाँधी, नरसिम्हा राव एवं अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने-अपने स्तर पर पार्टी से सम्बन्धित नितियों के आधार पर थोड़ी बहुत कोशिश की थी परन्तु संकल्प शक्ति के वह बहस नहीं की जो उन्हें करनी चाहिये । एक ही प्रधानमेंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ से हिम्मत जुटाकर अपना उद्बोधन हिन्दी को अपनी ही संसद के माध्यम से वह बहस नहीं की जो उन्हें करनी चाहिए । एक ही प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ से हिम्मत जुटाकर अपना उद्बोधन हिन्दी में दिया। हालांकि इससे पहले अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री की हैसियत में नहीं थे। जब बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने तो लोगों में आशाओं का संचार हुआ और उम्मीदें बँधी कि अब शायद हिन्दी को संवैधानिक दर्जा मिल जाये परन्तु वह सब कुछ सम्पन्न नहीं हो पाया जिससे हम वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी को लेकर अपनी बात को दमखम के साथ रखते । वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से उम्मीद की कुछ नयी किरणें बनी हैं कि शायद हमारी हिन्दी संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बन जाये इसके लिये सर्वप्रथम यह होना चाहिये कि सर्वसम्मत से संसद द्वारा हिन्दी को प्रथम वरीयता के रूप में संवैधानिक प्रस्ताव पास करके संविधान में राष्ट्रभाषा के रूप स्थापित किया जाये तब फिर हम इसे उत्साह से संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को अधिकारिक भाषा का स्थान दिलाने के लिये प्रयास करें।



संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने की विश्व (वैश्विक देशों) की सहयोगी संस्था है। और विश्व के लगभग 150 से अधिक देश इसमें अपना सक्रिय सहयोग देते हैं। भाषिक दृष्टि से यह संस्था इस समय छह भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है। जिसमें चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, फ्रेंच एवं अरबी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने स्थापना तथा चार्टर 1945 के समय जब अस्तित्व ने आया तो उस समय इसमें प्रमुख रूप से पाँच देश अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन ही थे। ये ही राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तत्कालीन सदस्य भी बने। संयुक्त राष्ट्र संघ में वर्तमान भाषाओं के बोलने वालों की बात करें (एन कार्टा एनसाइक्लोपीडिया) तो स्पेनिश 33 करोड़ 20 लाख, अंग्रेजी 32 करोड़ 20 लाख, अरबी 18 करोड़ 60 लाख, रूसी 16 करोड़ तथा फ्रेंच 4 करोड़ 20 लाख। इस प्रकार हम देखते हैं कि आज जो संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषाएं हैं उसने परिप्रेक्ष्य में हमारी बोलचाल की हिन्दी इस समय 80 करोड़ अभिजनों की विश्व भाषा के रूप में प्रथम स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में यह प्रावधान है कि इसमें किसी नई भाषा को मान्यता लेने के लिये इसकी जनरल असेम्बली 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित करके अधिकारिक भाषा के रूप में इसे मान्यता दिला सकती है। तथ्यों एवं आँकड़ों पर गौर फरमायें की इस समय हिन्दी बोलने वाले विश्व में पहले स्थान पर आ गये हैं। हिन्दी अपनी विशुद्ध वैज्ञानिक लिपि तथा अनुशासित भाषाके साथ सरल, बोधगम्य व शीघ्र ही समझ में आने वाली, साथ बहुत कम समय में सीखे जाने वाली भाषा है। हिन्दी का व्याकरण सरल होने के साथ यह भाषा उच्चारण एवं समझने में सुगम है। यही कारण है कि यह विश्व के हर कोने में इसका प्रचार-प्रसार हो रहा है। विदेशों में आज हिन्दी अपने पठन-पाठन व अध्ययन के लिये सुगम भाषा के रूप में ख्याति अर्जित करती जा रही है। वास्तविकता यह है कि विदेशों में हिन्दी भाषा में रचित साहित्य की मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इतना सब होने के बावजूद भी हिन्दी के प्रति अधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा दावा इतना मजबूत नहीं हो पा रहा है। कि उसे विश्व जनमत अधिकारिक भाषा का दर्जा दे सके। आखिर ऐसी कौन सी कठिनाइयां एवं परेशानियां है जिससे हमारी हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थान नहीं मिल पा रहा है ?



प्राथमिक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थापित करने के लिये तीन तरह के परेशानियां उपस्थित हो रही हैं - प्रथम दो तिहाई सदस्यों का बहुमत, दूसरे स्तर पर भारी आर्थिक खर्च, तीसरा कारण प्रमुख भाषाओं के अनुवाद की समस्या । जहाँ तक 2/3बहुमत की बात करें तो वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिये यह सबसे कठिन कार्य है। क्योंकि भारत की बढ़ती ताकत के प्रति कोई देश नहीं चाहता है कि इसे भाषिक दृष्टि से मजबूत किया जाये। अमेरिका एवं बिट्रेन की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए यह मजबूरी सी लगती है क्योंकि इस समय इस्लामी आतंक के रूप में वह भारत का पुरजोर समर्थन प्राप्त करने के लिये अपने यहाँ हिन्दी पढ़ाने की वकालत के साथ-साथ सरकारी स्तर पर सहयोग राशि भी हिन्दी पर अधिक खर्च कर रहा हैं क्योंकि यदि वे नहीं करते हैं तो वहाँ पर रहने वाले भारतवासी अमेरिका ब्रिट्रेन को उतना आर्थिक/भावनात्मक सहयोग नहीं देंगे। दूसरे देश भारत कोसहयोग इसलिए भी नहीं दे सकते हैं कि अमेरिका एवं ब्रिट्रेन आखिर भारत को इतनी वरीयता क्यों दे रहा है। हम यह याद दिला देना लाजिमी समझते हैं कि अरबी भाषा को संयुक्त संघ ने केवल इसलिये अधिकारिक भाषा के रूप में दर्जा मिला क्योंकि अमेरिका एवं ब्रिट्रेन को तेल की राजनीति करनी थी।फिलहाल कुछ भी हो भारत को इन अनुकूल परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिये एक बार पुनः जोर आजमाइश शुरू कर देना चाहिये।



संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता है कि यदि उसे स्थायी दर्जा सदस्य देश के रूप में या भाषा के रूप में जो भी मिलता है। उसको प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि इसके बनाये हुए कोशों में जमा करनी पड़ती है। इसलिये भारत के समक्ष यह बहुत बड़ी चुनौती है कि वह अपने आर्थिक ढाँचे में सुधार कर पहले संयुक्त राष्ट्र के मानकों को पूरा करे और अपनी आर्थिक नीति एवं मुद्रा स्फीति को वैश्विक स्तर पर लाकर विश्व के देशों के समक्ष कोई ऐसा मौका न दे कि कोई हमारी अर्थव्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा सके। तीसरी तरह की परेशानी संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत को हिन्दी भाषा के लिये अधिकारिक रूप में रखने के लिये अनुवाद की समस्या आ सकती है क्योंकि अन्य अधिकारिक भाषाओं और हिन्दी के बीच समानान्तर अनुवाद कराने का खर्च बहुत अधिक होगा। यही नहीं यांत्रिक दृष्टि से हमारी अभी अनुवाद की यांत्रिक प्रक्रिया बहुत सशक्त नहीं है कि हम दावे के साथ इस कह सकें । हमारा आशु अनुवाद यंत्रानुवाद के साथ अनुवाद प्रौद्योगिकी अभी बहुत विकसित नहीं हो पायी है। इसके लिये भारत की यंत्रानुवाद एवं सी-डेक तथा अनुवाद प्रौद्योगिकी की दिशा में महत्वपूर्ण अनुसंधान की जरूरत है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र में प्रचलित सभी भाषाओं के साथ हिन्दी में यंत्रानुवाद के कार्यक्रमों को भारत में उत्तरोत्तर विकास की आवश्यकता है। इन सबके अलावा भारतीय सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं भारतवासियों और अप्रवासी भारतीयों आदि का मानसिक/भाषिक/भावनात्मक सहयोग की दरकार भी चाहिये तभी हम हिन्दी की पताका संयुक्त राष्ट्र संघ में फहरा सकते है।
डॉ. वीरेन्द्र सिह यादव
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बाल अधिकार और उनका क्रियान्वयन

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December 15, २००८

रवि रतलामी - रचनाकार में प्रकाशित आलेख

वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : बाल अधिकार और उनका क्रियान्वयन
बाल अधिकार और उनका क्रियान्‍वयन
- डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव
बच्‍चे किसी भी समाज के भविष्‍य होते हैं। बच्‍चों को केन्‍द्र में रखकर ही कोई समाज या देश अपने राष्‍ट्र निर्माण की भावी संरचना का नवनिर्माण करता हैं क्‍योंकि बच्‍चे राष्‍ट्र की अमूल्‍य धरोहर एवं भावी संसाधन तथा सांस्‍कृतिक विरासत होते हैं। बाल्‍यकाल जीवन की सक्रिय एवं सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण अवस्‍था होती है। जो उसके भावी भविष्‍य की दिशाएं तय करती है। राष्‍ट्र के भावी निर्माण के लिए बच्‍चा केवल बच्‍चा ही नहीं होता है बल्‍कि अपने जन्‍म के साथ वह स्‍वयं भी एक माँ और पिता की जन्‍मता है। अर्थात्‌ नवजात शिशु अपने जन्‍म से ही एक सम्‍बन्‍ध को नया रिश्‍ता देता है साथ ही एक नया नाम एवं सम्‍बोधन देता है। स्‍वाभाविक रूप से अल्‍हड़, कोमल, नटखट और गोद में अठखेलियां तथा किलकारी भरा बचपन एक लय में उमंगों की छलागें एवं पेंगे नहीं मार पा रहा है क्‍योंकि सरकारों द्वारा उठाये गये पर्याप्‍त कानूनी कदमों के बाद उनका उचित क्रियान्‍वयन नहीं हो पा रहा है और बच्‍चों के लिए निर्धारित किये गये अधिकार एवं मौलिक अधिकारों का खुलेआम उल्‍लंघन किया जा रहा है।
यूनीसेफ की हाल में ही प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार विश्‍व में बच्‍चों की सर्वाधिक संख्‍या भारत में है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ बच्‍चे जन्‍म लेते हैं। यह संख्‍या चीन सहित विश्‍व के किसी भी राष्‍ट्र में एक वर्ष में जन्‍म लेने वाले बच्‍चों की संख्‍या से अधिक है। भारत में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों की संख्‍या 37.5 करोड़ तथा छः वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों की संख्‍या 15.8 करोड़ है। प्राथमिक शिक्षा को कानूनी दर्जा मिल जाने के बावजूद तीन करोड़ से अधिक बच्‍चे अभी भी प्राथमिक विद्यालयों में अपनी उपस्‍थिति दर्ज नहीं करा पा रहे हैं। दो करोड़ से अधिक बच्‍चे नौकर के रूप में कार्य करने के साथ-साथ चाय की दुकानें, स्‍कूटर एवं कारों की मरम्‍मत, ढाबों, भवन निर्माण, कुलीगीरी, कालीन उद्योग, जरी की कढ़ाई, दियासलाई, आतिशबाजी, बीड़ी तथा पीतल उद्योगों, चूड़ी निर्माण जैसे जोखिमपूर्ण उद्योगों में लगे हुए हैं। दो तिहाई से ज्‍यादा श्रमजीवी बच्‍चे गम्‍भीर चोटों का सामना जलना, त्‍वचा की बीमारी, आँख की रोशनी एवं साँस की बीमारी सहते हुए असहाय सा जीवन जीकर काल कवलित हो जाते हैं - यह स्‍थिति भारत में ही नहीं वरन्‌ विश्‍व के सभ्‍य एवं विकसित देशों में किसी भी पैमाने पर कम नहीं देखी जा रही है। अर्थात्‌ विश्‍व के राष्‍ट्र बच्‍चों के द्वारा निर्धारित अधिकारों के प्रति सचेत नहीं जान पड़ते।
बच्‍चे के अधिकारों के प्रति सर्वप्रथम अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर वर्ष 1989 में तैयार किये गये बाल अधिकार कन्‍वेंशन में इन विशिष्‍ट अधिकारों को बच्‍चों के मौलिक अधिकार के रूप में स्‍वीकार किया गया। जिसको भारत सहित लगभग सम्‍पूर्ण विश्‍व द्वारा मान्‍यता प्रदान की गई। 20 नवम्‍बर 1989 को संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा द्वारा बच्‍चों के अधिकारों की सुरक्षा सम्‍बन्‍धी एक प्रस्‍ताव स्‍वीकार किया गया। इस सम्‍मेलन का उद्देश्‍य बच्‍चों को कहीं भी उनके शोषण, दुरूपयोग और घृणा से मुक्‍ति दिलाना था। इसका विस्‍तृत विवरण सन्‌ 1990 में आयोजित विश्‍व बाल सम्‍मेलन में किया गया॥ जिसके द्वारा प्रत्‍येक बच्‍चे को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्‍कृतिक अधिकार प्रदान करने पर विशेष बल दिया गया। बच्‍चों की अन्‍य गम्‍भीर समस्‍याएं जिनमें बाल श्रम मुख्‍य है के लिए 27-30 अक्‍टूबर 1997 में नार्वे की राजधानी ओस्‍लो में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ द्वारा एक बाल श्रम पर अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आयोजन विश्‍व के लोगों का ध्‍यान बच्‍चों के अधिकार एवं समस्‍याओं की ओर आकर्षित करने का विशेष प्रयास किया गया। संयुक्‍त राष्‍ट्र की विशेष महासभा में 08.10.2002 के द्वारा बच्‍चों के विकास, कल्‍याण एवं सुरक्षा हेतु विशेष रणनीति बनाई। इस रणनीति में बच्‍चों के 54 मूलभूत अधिकारों को पारित किया गया। जिनमें से प्रमुख रूप से अनु. 1 के तहत बच्‍चे की परिभाषा दी गई है। इसके अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के बच्‍चे इस श्रेणी में रखे गये हैं। अनु. 2 विभेदहीनता, अनु. 3 में बच्‍चे की अनुकूल अभिरूचियां, अनु. 4 में उनके अधिकारों का कार्यान्‍वयन कैसे हो दिया गया है। अनु. 5 में माता पिता का मार्गदर्शन तथा बच्‍चों की क्षमताएं, जीवित रहने का जन्‍मजात अधिकार अनु. 6 में दिया गया है। वहीं अनु. 7-8 में बच्‍चे का नाम राष्‍ट्रीय तथा पहचान एवं संरक्षण के बारे में बताया गया है। अनु. 9-10 में माता-पिता से पृथकता तथा पारिवारिक पुनः एकीकरण का अधिकार बताया गया है। अनु. 11 में अवैध स्‍थानान्‍तरण एवं गैर वापसी के बारे में बताया गया है। अनु. 12 में बच्‍चे की राय अनु. 14-14 में अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता एवं विचार, आत्‍मा की आवाज एवं धर्मदर्शन की स्‍वतंत्रता प्रत्‍येक बच्‍चे को प्रदत्‍त की गई है। अनुच्‍छेद 15-16 में संगठित होने की स्‍वतंत्रता एवं गोपनीयता के संरक्षण की बात कही गयी है। वहीं अनु. 17-18 में सूचना को पहुँचाने तथा माता-पिता के उत्‍तरदायित्‍व का वर्णन मिलता है। अनु. 19-20-21 में दुरूपयोग एवं उपेक्षा से संरक्षण, परिवार, विद्वान बच्‍चों का संरक्षण एवं गोद लिए जाने का प्रावधान किया गया है। अनु. 22, 23, 24 शरणार्थी बच्‍चे, बाधित बच्‍चे एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के बारे में विशेष बल दिया गया है। अनु. 25 देखभाल एवं संस्‍था में रखने का पुनरावलोकन तथा अनु. 26-27 स्‍वाभाविक सुरक्षा, जीवन स्‍तर में सुधार की पूर्ति का वर्णन किया गया है। अनु. 28-29 में शिक्षा एवं शिक्षा के उद्देश्य के बारे में निर्देशित किया गया है। अनु. 30 अल्‍पसंख्‍यक समुदायों/देशी मूल के बच्‍चों के बारे में बताया गया है। अनु. 31 में रिक्‍त समय में मनोरंजन एवं सांस्‍कृतिक गतिविधियों के बारे में निर्देशित किया गया है। अनु. 32 में बाल श्रम तथा अनु. 33, 34, 35, 36, 37 में क्रमशः मादक द्रव्‍यों का दुरूपयोग, लैंगिक शोषण, विक्रय, व्‍यापार, अपहरण व शोषण से संरक्षण तथा उत्‍पीड़न एवं स्‍वाधीनता से वंचित होने को निषिद्ध किया गया है। अनु. 38, 39, 40, 41 में सैन्‍य संघर्ष, पुनर्वास सम्‍बन्‍धी देखभाल, बाल न्‍याय का प्रशासन तथा वर्तमान मानदण्‍डों के प्रति सम्‍मान को रेखांकित किया गया है। अनु. 40-45 में बच्‍चों के प्रदत्‍त अधिकार को प्रभावपूर्ण कार्यान्‍वयन, पोषण एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सहयोग हेतु संयुक्‍त राष्‍ट्र के विभिन्‍न अभिकरणों यथा-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय श्रम संगठन, विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन, यूनेस्‍को और यूनीसेफ समिति की बैठकों में उपस्‍थित हो सकेंगे। अनु. 46 से 54 के विशिष्‍ट बिन्‍दुओं में हस्‍ताक्षर अनु. समर्थन, प्रवेश, लागू होने वाले संशोधन, शंकाएं, प्रख्‍यापन तथा प्रमाणिक अभिलेखों के बारे में विवरण दिया गया है। संयुक्‍त राष्‍ट्र समझौते के अनुसार इन अधिकारों के तहत बच्‍चों के सर्वांगीण विकास के लिए न्‍यूनतम जीवन स्‍तर सुनिश्‍चित करना तथा प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्‍यवस्‍था करना सबसे महत्‍वपूर्ण माना गया है।
भारतीय संविधान भी बच्‍चों के मूलभूत अधिकारों पर विशेष बल देता है जिनमें बाल श्रम को रोकने के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं। हमारे संविधान का अनुच्‍छेद 15, राज्‍यों की महिलाओं और बच्‍चों की सुरक्षा के लिए विशिष्‍ट प्रावधान करने की शक्‍ति देता है। अनु. 24 में 14 वर्ष से कम आयु के बच्‍चों को कारखानों एवं अन्‍य जोखिम पूर्ण कार्य में नियोजन का प्रतिरोध किया गया है। वहीं आर्थिक आवश्‍यकताओं की वजह से किसी व्‍यक्‍ति से उसकी क्षमताओं से परे काम करवाने का अनु. 39 (ई.-एफ) प्रतिरोध करता है। अनु. 45 के द्वारा बालकों के लिए निःशुल्‍क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान उपलब्‍ध कराने का राज्‍य को निर्देश दिया गया है। भारतीय संसद के द्वारा इन संवैधानिक व्‍यवस्‍थाओं के तहत 1974 में एक राष्‍ट्रीय नीति स्‍वीकार की गई जिसने घोषित किया कि बच्‍चों की उपेक्षा, क्रूरता और शोषण से रक्षा की जायेगी और 14 वर्ष से कम का कोई भी बच्‍चा अनिश्‍चितता वाले व्‍यवसाय या भारी कार्य में नहीं लगाया जायेगा। भारत में उन संवैधानिक प्रावधानों के अतिरिक्‍त अनेक ऐसे महत्‍वपूर्ण विधान दिये गये हैं जो बच्‍चों को विभिन्‍न व्‍यवसायों के तहत कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं। 14 वर्ष की कम उम्र का व्‍यक्‍ति फैक्‍ट्री एक्‍ट 1948 के तहत रोजगार नहीं कर सकता है। बागान एक्‍ट 1951 तथा खान एक्‍ट 1952 के तहत 15 वर्ष की उम्र में कार्यों पर प्रतिबन्‍ध लगाया गया है। कुछ प्रमुख अधिनियम अनुबंधित श्रमिक अधिनियम 1975, बाल श्रमिक (निवारण और नियमितीकरण) 1986 तथा 1987 की राष्‍ट्रीय बाल श्रम नीति के अन्‍तर्गत बाल श्रमिकों को शोषण से बचाने और उनकी शिक्षा, चिकित्‍सा, मनोरंजन तथा सामान्‍य विकास पर जोर देने की व्‍यवस्‍था की गयी है। इसके साथ ही भारत सरकार अपनी विभिन्‍न पंचवर्षीय योजनाओं में बालकों के अधिकार एवं बाल श्रमिकों के उत्‍थान के लिए कई कार्यक्रम शुरूआत किए हुए है। सरकार के अलावा कई गैर सरकारी स्‍वैच्‍छिक संगठन भी इस दिशा में गम्‍भीरता से प्रयासरत हैं।
हमें बड़े दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि विभिन्‍न वैश्‍विक संवैधानिक प्रावधानों और सरकारी तथा गैर सरकारी उपायों के बावजूद हम बच्‍चों के उनके मौलिक अधिकार एवं मानवाधिकार को उपलब्‍ध नहीं करा पा रहे हैं अर्थात्‌ आज लाखों-लाख बच्‍चे गरीबी, आतंकवाद, भीख मंगवाना, धनाढ्यों के मनोरंजन के लिए उन्‍हें विदेश भिजवाना, तस्‍करी जैसे कार्य करवाना, बालश्रम, बाल व्‍यापार, कुपोषण, अशिक्षा, बाल अपराध, बाल सैनिक, विस्‍थापन, बालिका भ्रूण हत्‍या, विज्ञापनों के प्रयोग में बालकों का मानसिक एवं शारीरिक शोषण, बाल यौन दुराचार और युद्ध जैसे कई कारणों से पलायन करने वाले परिवारों के साथ सीमा पर सैनिकों की कामवासना का शिकार होने के अलावा उन्‍हें विभिन्‍न तरीकों से शारीरिक मानसिक और संवेगात्‍मक रूप से प्रताड़ित करने, उनके दैहिक और आर्थिक शोषण करने एवं मूलभूत सुविधाओं से वंचित करने के लिए ऐसी तकनीकों और प्राविधियों का प्रयोग किया जा रहा है, जो मानवता के नाम पर कलंक है। निष्‍कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि विकराल होती बाल अधिकारों की समस्‍या को आज कानूनी और मानवाधिकार की दृष्‍टि से देखने के साथ-साथ उसके मानवीय, सामाजिक तथा व्‍यावहारिक पहलू से भी देखे जाने की आज शिद्दत के साथ आवश्‍यकता है तभी हम इन जमीं के नन्‍हें-मुन्‍नें सितारों को शारीरिक रूप से स्‍वस्‍थ, मानसिक रूप से सजग तथा नैतिक रूप से आदर्श नागरिक बना सकते हैं।
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सम्‍पर्क -वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग
डी. वी. कालेज, उरई (जालौन) 285001 उ. प्र.
इसे प्रकाशित किया Raviratlami ने,

कृतिका...... शोधपरक पत्रिका

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पत्रिका-कृतिका अंक-जुलाई-दिसम्बर08, स्वरूप-अर्द्धवार्षिक, प्रधान संपादक-डाॅ। चन्द्रमा सिंह, संपादक-डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव, संपर्क-1760, नया रामनगर, उरई, जालौन 285.001 (उ.प्र.) भारत

इंटीग्रेटेड सेन्टर फाॅर वल्र्ड स्टडीज, उरई जालौन उ.प्र. का यह शोध परक अर्द्धवार्षिक पत्र है। पत्रिका में साहित्य, कला, संस्कृति, आयुर्वेद, मानविकी, एवं समाज विज्ञान की शोधपरक रचनाएं प्रकाशित की जाती हैं। इस अंक में भाषा एवं साहित्य पर दो रचनाएं (प्रोफेसर राम चैधरी, डाॅ. तिलक राज), धरोहर के अंतर्गत तीन रचनाएं (डाॅ. किशन यादव, डाॅ. दिवस कांत समाथिया, ज्योति श्रीवास्तव), आध्यात्म एवं दर्शन के अंतर्गत डाॅ. अनिल कुमार सिन्हा का आलेख प्रकाशित किया गया है। आधी दुनिया का यथार्थ (डाॅ शुभा चैधरी, डाॅ. चम्पा श्रीवास्तव, डाॅ. जार्ज कुट्टी, चित्रा आम्रवंशी, आकांक्षा यादव), संगीत के अंतर्गत डाॅ. ज्योति सिन्हा की शोध परक रचनाएं प्रभावित करती हैं। संवाद के अतर्गत डाॅ. लक्ष्मी सिंह यादव तथा निरूत्तर के अंतर्गत डाॅ. महालक्ष्मी जौहरी की रचनाएं शोध परक रचनाओं की कसौटी पर कुछ पीछे दिखाई देती हैं। नागरिक समाज में डाॅ. अजय सिंह एवं डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव का दृष्टिकोण नितांत शोधपरक है जो विषय वस्तु का प्रतिपादन करने में पूरी तरह सक्षम है। लोक साहित्य में हसीन खान, अमृता पीर, ममता यादव में से भोजपुरी कला पर अमृता पीर द्वारा लिखा गया शोधालेख विशेष प्रभावित करता है। इतिहास के अंतर्गत डाॅ. उमारतन, डाॅ. शंकरलाल, कु. अनीता सिंह के शोधपत्र अच्छे बन पड़े हैं। समकालीन सृजन के अंतर्गत डाॅ. राधा वर्मा एवं डाॅ. सुरेश फाकिर में मौलिकता की गंध है। लीला चैहान एवं शम्स आलम में से लीला को शेखर एक जीवन पर पुनः विचार कर इस शोध को फिर से लिखना चाहिए क्योंकि अभी इसमें वह धार नहीं आ पाई है जो शेखर इस उपन्यास के प्रमुख बिंदुओं को उभार सके। डाॅ. चन्द्रमा सिंह तो आलोचना का विश्लेषण बहुत ही अच्छी तरह कर पाए हैं लेकिन क्रांतिबोध को और भी अधिक अध्ययन कर अपना शोध प्रस्तुत करना चाहिए था। सुलगते सवाल, बीच बहस में तथा शोधार्थी के अंतर्गत ली गई रचनाएं भी उच्च कोटि की व प्रभावशाली है। यदि आप गंभीर शोध परक साहित्य पढ़ना चाहते हैं तो यह पत्रिका आप ही के लिए है।
Posted by अखिलेश शुक्ल at 6:11 AM 0 comments
Tuesday, January 27, 2009

नेह एवं आत्मीयता की भाषा : राष्ट्रभाषा हिन्दी

अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.16.2009

नेह एवं आत्मीयता की भाषा : राष्ट्रभाषा हिन्दी
डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव


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अपनी उत्पत्ति के साथ मानव ने सभ्यता और संस्कृति के विकास-सोपान के साथ भाषा के विकास की परम्परा भी अपनाए रखी। भाषा-विकास-परम्परा में सरलीकरण की प्रक्रिया इसी बात को इंगित करती है कि मानव-समुदाय भाषागत व्याकरणिक बन्धनों में जकड़ा नहीं रह सकता क्योंकि भाषा मनुष्य के हृदय की वस्तु नहीं अपितु आह्लाद, अनुभवों व भावों को व्यक्त करने वाली होती है। यही नहीं भाषा के द्वारा संस्कृति, संस्कार व राष्ट्र का निर्माण भी होता है। भाषा के द्वारा जहाँ एक ओर राजनीतिक संकल्पना की पूर्ति सम्पन्न होती है, वहीं दूसरी ओर समाज, व्यक्ति और विचार को आमूल-चूल परिवर्तित कर देने की प्रचण्ड शक्ति भी होती है। देखा जाये तो जहाँ एक ओर भाषा क्रांति का बीज साबित होती है वहीं दूसरी ओर शांति का मंत्र भी सिद्ध होती है। भाषा के द्वारा खण्डित एवं टूटे हुये दिलों को जहाँ एक ओर जोड़ा जा सकता है वहीं दूसरी ओर इसके रसायन से दिलों को तोड़ा भी जा सकता है। यही नहीं भाषा संवेदना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम् है।

अभिव्यक्ति या सम्पर्क के लिये एक मात्र सशक्त माध्यम भाषा ही है। भाषा का यह माध्यम तब और अधिक लोकप्रिय हो जाता है जब अधिक से अधिक लोग सर्वसम्मत एवं प्रचलन के रूप में उसे प्रयोग में लाते हों। भाषा का यह रूप ’लिंक लैंग्वेज‘ अर्थात सम्पर्क भाषा के रूप में जाना जाता है। कोई भी राष्ट्र राजनीतिक, व्यावहारिक दृष्टि से बिना सम्पर्क भाषा के विकास के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता है। संस्कृति, संस्कार तथा व्यावहारिक दृष्टि से भी सम्यक भाषा ही जनता के भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। कोई भी राष्ट्र तभी परम्परागत सांस्कृतिक महिमा से मंडित हो सकता है जब वहाँ की एक सम्पर्क भाषा हो। हिन्दी हमारे देश की सम्पर्क भाषा, राष्ट्रभाषा बनने में पूर्णतः सक्षम है क्योंकि ’’हिन्दी उदारता की भाषा है; हिन्दी चरित्र निर्माण व संस्कारों की भाषा है; हिन्दी नेह व आत्मीयता की भाषा है, उसने अपने प्रांगण में अपनत्व भाव से आई भाव व शब्द की सम्पदा का निरन्तर आतिथ्य किया है; आत्मीयता का वरण किया है। ...... स्नेह का उत्कर्ष इतना है कि एक बार हिन्दी के आँचल में आश्रय पा चुका शब्द वापस नहीं हो सका और हिन्दी का ही होकर रह गया। अतिथियों (शब्दों) को आत्मसात् करने की तथा परम उदारता की बात निःस्वार्थ भाव से विश्व की कोई भी भाषा हिन्दी से सीखे। आज हज़ारों ऐसे देशी-विदेशी शब्द हिन्दी के शब्द-भंडार की शोभा बढ़ा रहे हैं। बहुउद्देशीय शब्दों को पचाने व अपने में समाने की सामर्थ्य हर भाषा में सम्भव नहीं, यह केवल हिन्दी भाषा की व्यापकता व विशाल हृदयता का ही परिचायक है। भाषा का महत्व किसी भी रूप में देश की सीमा की रक्षा कर रहे सैनिकों से कमतर नहीं है। ज्ञान, चेतना व चिंतन की मूल धुरी है भाषा।” स्पष्ट है कि विश्व भाषा के रूप में हिन्दी का विकास उसके गुणों के कारण ही हो रहा है। साहित्यिक, धार्मिक तथा सामाजिक चेतना के लिये हिन्दी की पहचान भारत के बाहर अन्य देशों में बहुत अधिक हुई है। यह सिद्ध हो चुका है कि हिन्दी-लिपि एक विशुद्ध वैज्ञानिक व अनुशासित लिपि है। हिन्दी भाषा सरल, बोधगम्य व शीघ्र ही समझ में आने वाली तथा अल्प समय में सीखी जाने वाली भाषा है। अपनी व्याकरणिक विशेषताओं के कारण उच्चारण एवं पढ़ने में हिन्दी भाषा जैसी विश्व की कोई भाषा नहीं है। नूतन आँकड़े यह सिद्ध करते हैं कि विश्व में इस समय हिन्दी बोलने वाले प्रथम स्थान पर आ गये हैं, यह बात आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि विदेशों में हिन्दी भाषा-साहित्य दिनों-दिन प्रगति पथ पर नये सोपान स्थापित कर रही है। वहीं हमारे अपने देश भारत में जो स्वाधीन, सार्वभौम, प्रभुसत्तात्मक राष्ट्र का प्रतीक है, जहाँ हमारा एक राष्ट्रध्वज, एक राष्ट्रगान होने के बावजूद हमारी एक राष्ट्रभाषा क्यों नहीं हो पायी है, वर्तमान समय में यह शोध का विषय है।

निश्चित रूप से भाषा को लेकर हमारे समक्ष यक्ष प्रश्नों की स्थिति बनी हुई है। विरोधाभासों की वर्तमान दुनिया में वैज्ञानिक विकास के कारण सम्पूर्ण विश्व आपसी जुड़ाव, समन्वय तथा एक छोटी सी बस्ती में तब्दील होता जा रहा है। किसी एक देश की घटना का प्रभाव दूसरे देश पर पड़े बिना नहीं रह सकता। यही कारण है कि विज्ञान, तकनीक, सम्पदा और समृद्धि की ऊँचाइयाँ छूने की दौड़ तेज़ होती जा रही है जिससे वैचारिक तथा भाषाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे विस्तृत हो रहे हैं। भाषा की इस अभिव्यक्ति ने जनता और सत्ता; सम्पत्ति और चालबाजी; व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों स्तरों पर, विचार-शून्यता की स्थिति से आगे लाकर विचार-प्रेषण की स्थिति में खड़ा कर दिया है। क्योंकि वर्तमान समय में मनुष्य केवल अपने स्तर एवं हित के अलावा कुछ सोच ही नहीं पा रहा है। वर्तमान में हिन्दी की यह स्थिति हो गई है कि हमारे माननीय सत्ता के मनमाने-मनचाहे उपयोग को ललकारने की बात तो दूर रही, वास्तव में अब हिन्दी भाषा सत्तासीन लोगों का हथियार या उनके हाथ का खिलौना बनती जा रही है। हिन्दी आज राज का दर्जा पाने के लिये सत्ता के गलियारों में भटक रही है इस आस में कि उसे भी नियामतो का एक अंश मिल जायेगा, परन्तु यह सब कैसे और कब तक चलेगा अभी भविष्य के गर्भ में है।

निश्चित रूप से हमारे समक्ष यह एक विकट परिस्थिति है पर ऐसा नहीं कि सब कुछ अँधकारमय एवं अनिश्चित है। हिन्दी की इस दुस्सह स्थिति में भी आशा के दीपक जगमगा रहे हैं। अनेक विद्वान लेखक, कवि, आलोचक, सक्रिय समाजकर्मी और मानवीय संवेदना तथा प्रतिबद्धताओं से ओतप्रोत सृजनशील व्यक्ति यथास्थिति का बेबाक चित्रण ही नहीं कर रहे हैं अपितु ये लोग हिन्दी के एक वैकल्पिक विश्व की अवधारणा, परिकल्पना और सम्भावना के चितेरे भी हैं। इन लोगों के द्वारा हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु इस दिशा में निजी और संगठित स्तर पर अनेक रूपों में प्रबल प्रयास चल रहे हैं। हिन्दी भाषा को लेकर खड़े विविध यक्ष प्रश्नों पर व्यापक विमर्श यानी विचारणा-अनुसंधान साथ ही सक्रिय ज़मीनी कार्यों की ज़रूरत है। हमें पूरा विश्वास है कि हमारे देश की गंगा-जमुनी संस्कृति की प्रज्ञा शक्ति अपनी हिन्दी सर्जना से न केवल जनमानस को आह्लादित करेगी वरन उसे आलोड़ित कर हिन्दी को भूमण्डलीकरण की प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदार बना कर उसके इक़बाल को बुलंद करेगी।

अभिमन्यु अनत के शब्दों में कहें तो -

मेरे दोस्त,

उस भाषा में मेरे लिये,

शुभ की कामना मत कर,

जिसकी चुभती धुन मुझे,

उन गुलामी के दिनों की याद दे जाती है,

चाबुक की बौछारों का आदेश,

निकलता था जिस भाषा में,

उस भाषा को मेरी भाषा मत कह,

मेरे दोस्त।


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